Feature Top (Full Width)

Tuesday, 7 March 2017

तीसरा अध्याय: पहले करो या मरो की सोचें फिर भाग्य आजमाएं

दो अध्याय के बाद तीसरा अध्याय उन विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जो अपना ेभाग्य आजमाने आए हैं, अथवा लॉटरी खोजने आए हैं और जल्दी ही अफसर बनकर घर-परिवार वालों के सारे अरमान पूरा करके स्टेटस बना लेने का सपना बनाकर आए हैं। भावनाओं में बह कर इस तरह का फैसला कतई न लें। पहले यह मन बना लें कि मेरे लिए सिर्फ एसएससी ही है और कुछ नहीं। इसके लिए पूरी तरह से कमिटेड होकर तैयारी करेंगे। चाहे सारी दुनिया छूट जाए लेकिन हम एसएससी की परीक्षा की तैयारी नहीं छोड़ेंगे। इसके बीच में घर-परिवार में शादी-ब्याह, त्यौहार व जश्न आदि आएं तो आती रहें, परीक्षा तक दूर ही रहें।
तैयारी का पहला भाग दृढ़ मानसिक तैयारी है। उसके बाद की तैयारी के लिए खुद को तैयार करने के लिए विद्यार्थी के पांच लक्षणों को अपनाना होगा। ये पांच लक्षण इस श्लोक में दर्शाए गए हैं:-
काक चेष्टा बको ध्यानम् स्वान निद्रा तथैव च।
अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम् ।।
इसका अर्थ है विद्यार्थी को कौए के समान बार-बार चेष्टा यानी प्रयास करना चाहिए। बगुले के समान ध्यानमग्न हो जाना चाहिए। कुत्ते के समान सजग नींद लेनी चाहिए। कम भोजन करने वाला और गृह के मोह से दूर रहना चाहिए।
एसएससी की तैयारी के लिए सबसे अधिक ध्यान यानी कन्सनट्रेशन पर ध्यान देना जरूरी है। हमें अपने लक्ष्य पर अर्जुन लक्ष्य की तरह नजर रखनी होगी। यह कहानी तो आपने सुनी होगी जब द्रुपद देश में अज्ञात वास के बाद अर्जुन भी पांडवों के साथ  द्रोपदी के स्वयंवर में भाग लेने के लिए पहुंचे तो तमाम देश के राजा पेड़ पर घूमती मछली की आंख पर निशाना लगाने के प्रयास में निराश होकर बैठ चुके थे। तब पांडवों ने जब स्वयंवर की इस कड़ी परीक्षा में भाग लेने की आज्ञा मांगी तब गुरुजी ने अपने सभी शिष्यों से लक्ष्य के बारे में पूछा तो किसी ने कहा कि पेड़ दिख रहा है, पेड़ की डाल दिख रही है, कोई चिडिय़ा दिख रही है कहा, पर जब अर्जुन से पूछा तो उसने एक ही जवाब दिया कि मुझे तो सिर्फ चिडिय़ा की आंख दिख रही है और कुछ नहीं। अर्जुन के इस जवाब से संतुष्ट होकर जब उसे अनुमति मिली तो उसने अपने काम को सही अंजाम दिया और परिणाम भी सकारात्मक निकला।
अर्जुन के समान ही एसएससी के परीक्षार्थियों को सिर्फ अर्जुन के समान चिडिय़ा की आंख हीे दिखनी चाहिए और कुछ नहीं। एक बार यह संकल्प दोहराएं कि मेरे लिए एसएससी के करो या मरो ही है और कुछ नहीं। इस संकल्प मिनट दो मिनट के लिए नहीं होना चाहिए बल्कि लक्ष्य प्राप्ति तक होना चाहिए अथवा जीवन का मूल मंत्र ही बना लेना जरूरी होगा। इसके लिए स्वामी विवेकानन्द का विचार सटीक बैठता है-
उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत

No comments:

Post a Comment